Suttanipat - सुत्तनिपात (मूलपालि तथा हिन्दी अनुवाद) paperback book
सुत्तनिपात (मूलपालि तथा हिन्दी अनुवाद)
Code No- H119
सुत्तनिपात खुद्दकनिकाय का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, महत्त्वपूर्ण इसलिए कि इसमें ऐसे सुत्त हैं जिनमें बुद्ध के उपदेशों का सार है यह प्राचीन भी है। इसकी प्राचीनता इस बात से सिद्ध होती है कि इसमें पाये जाने वाले तुवटकसुत्त, मुनिसुत्त, नालकसुत्त तथा सारिपुत्तसुत्त अशोक के भाब्रू शिलालेख में विभिन्न नामों से पाये जाते हैं। इसकी भाषा भी वैदिक भाषा से साम्य रखती है।
अत्तदण्डसुत्त में भगवान बुद्ध के गृह-त्याग के कारण बताये गये हैं, पधानसुत्त में गौतम और मार के बीच कथोप-कथन है तथा इसी में मार की दस सेनाओं का वर्णन है जो वस्तुत: हमारे भीतर की कमजोरियां हैं। सतिपट्ठानसुत्त में यह बताया गया है कि हमारे भीतर तृष्णा क्यों और कैसे उत्पन्न होती है और इसे कैसे रोका जा सकता है। यह सुत्त विपश्यना से घनिष्ठ रूप से संबंधित है।
जरासुत्त में अनित्यता का वर्णन है और रतनसुत्त में बुद्ध, धर्म और संघ रूपी रतनों पर विशेष प्रकाश डाला गया है। पसूरसुत्त में विवाद की निरर्थकता दिखायी गयी है और सारिपुत्तसुत्त में भिक्षु की चर्या का सविस्तार वर्णन है।
पारायण वर्ग में बावरी ब्राह्मण के सोलह शिष्यों द्वारा विभिन्न विषयों पर भगवान से पूछे गये प्रश्नों के उत्तर हैं। जिन्हें आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए जानना आवश्यक है।
अत: सुत्तनिपात का यह हिन्दी अनुवाद साधकों के लिए तो अत्यंत उपयोगी है ही जो साधक नहीं भी हैं पर बुद्ध की शिक्षा में रुचि रखते हैं, उनके लिए भी यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।



