Tipitaka Mein Samyak Sambuddha - Part 2 * तिपिटक में सम्यक सम्बुद्ध- भाग 2
तिपिटक में सम्यक संबुद्ध - भाग 2
बुद्ध की शिक्षा के बारे में विपश्यना के प्रमुख आचार्य श्री. स. ना. गोयन्काजी ने जो सुन रखा था उससे प्रथम विपश्यना शिविर में भाग लेने में उन्हें हिचकिचाहट का अनुभव हुआ। प्रथम शिविर में भाग लेने के बाद बुद्ध के शुद्ध उपदेश के बारे में जो भी उनके मन में दुर्भावनाएं या भ्रांतियां थीं वे सभी व्यक्तिगत अनुभूति की आंधी में उड़ गयीं। इतना ही नहीं उनमें बुद्ध के मूलवचन को पढ़ने की प्रेरणा जगी।
आज भी प्रत्येक साधक उसी तरह की हिचकिचाहट से गुजरता है और उसके भी मन में शिविर के बाद बुद्ध के मूलवचनों को जानने की उत्सुकता होती है। इसी उद्देश्य से गोयन्काजी ने तिपिटक (जिसमें बुद्ध के मूलवचन संगृहीत हैं) की एक लंबी भूमिका लिखने का मन बनाया ताकि बुद्ध तथा उनकी शिक्षा के बारे में वे प्रामाणिक सूचना दे सकें। यह उन्होंने तिपिटक से उद्धरण देकर, पालि तिपिटक से प्रेरणा देनेवाले उद्धरणों को देकर तथा बुद्ध के जीवन में घटी घटनाओं का उल्लेख कर किया है।
गोयन्काजी के शब्दों में तिपिटक एक विस्तृत बगीचा है जहां अनेक प्रकार के रंग-बिरंगे सुंगधित फूल खिले हैं। इस बगीचे से कुछ फूलों को मैंने चुना है और एक माला तैयार की है। धर्म के इस विशाल समुद्र से कुछ अमूल्य रत्नों को चुन कर मैंने एक रत्नखचित अलंकार बनाया है।
विपश्यना विशोधन विन्यास से छः भागों में प्रकाशित यह पुस्तक विपश्यी साधकों, शोधकर्त्ताओं तथा बुद्ध की शिक्षा को जानने में रुचि रखनेवालों के लिए आदर्श है।
In the words of Mr. Goenka, "The Tipitaka is like a vast, captivating garden containing beautiful flowers of different hues and fragrances. I have plucked a few flowers from that garden and have woven them into a garland. This jeweled ornament has been fashioned by culling a few priceless gems from the vast ocean of the Dhamma”.
Published by VRI, this series of six books is ideal for Vipassana meditators and research scholars interested in the Buddha’s teaching.

















